कल्पना कीजिए… आप कार की पिछली सीट पर बैठे हैं। स्टीयरिंग पर कोई नहीं है। कार खुद ट्रैफिक में रास्ता बना रही है, सिग्नल पहचान रही है, ब्रेक लगा रही है और आपको आपके ऑफिस तक सुरक्षित छोड़ रही है।
सवाल ये है — क्या 2030 तक ऐसा भारत में आम हो जाएगा? क्या सच में ड्राइवर की जरूरत समाप्त होने वाली है? या यह सिर्फ टेक कंपनियों का बड़ा सपना है?
इस सवाल में डर भी है और जिज्ञासा भी। आइए सच्चाई समझते हैं।
सेल्फ ड्राइविंग टेक्नोलॉजी असल में है क्या?
सेल्फ ड्राइविंग कारें सेंसर, कैमरा, रडार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से चलती हैं। ये सिस्टम सड़क, ट्रैफिक, पैदल चलने वालों और दूसरे वाहनों को पहचानते हैं। फिर कंप्यूटर फैसला लेता है कि कार को कब मुड़ना है, कब रुकना है और कितनी स्पीड रखनी है।

टेक्नोलॉजी को आम तौर पर 5 लेवल में बांटा जाता है:
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लेवल 1 और 2: ड्राइवर की मदद करने वाली तकनीक (जैसे ऑटो ब्रेकिंग, लेन असिस्ट)
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लेवल 3: कुछ परिस्थितियों में कार खुद चल सकती है
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लेवल 4 और 5: पूरी तरह ड्राइवरलेस सिस्टम
आज दुनिया में ज्यादातर कारें लेवल 2 या सीमित लेवल 3 पर हैं। पूरी तरह ड्राइवरलेस कारें अभी भी टेस्टिंग और सीमित क्षेत्रों तक ही सीमित हैं।
क्या 2030 तक ड्राइवर समाप्त हो जाएंगे?
ईमानदारी से कहें तो 2030 तक पूरी तरह ड्राइवर की जरूरत समाप्त हो जाना मुश्किल लगता है — खासकर भारत जैसे देश में। कारण साफ हैं: पहला, भारत की सड़कें पश्चिमी देशों जैसी व्यवस्थित नहीं हैं। दूसरा, ट्रैफिक पैटर्न बहुत जटिल है। तीसरा, अचानक आने वाली बाधाएं — जानवर, बिना संकेत मुड़ते वाहन, अनियमित लेन — AI के लिए चुनौती हैं।
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सेल्फ ड्राइविंग सिस्टम को परफेक्ट काम करने के लिए साफ लेन मार्किंग, सख्त ट्रैफिक नियम और स्थिर ड्राइविंग कल्चर चाहिए। भारत में अभी ये सभी चीजें एक जैसी नहीं हैं।
भारत में कानूनी स्थिति क्या है?
भारत में अभी पूरी तरह ड्राइवरलेस कारों की अनुमति नहीं है। कानून के मुताबिक, सड़क पर वाहन चलाने के लिए एक जिम्मेदार ड्राइवर का मौजूद होना जरूरी है। अगर AI कार दुर्घटना कर देती है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? कार कंपनी की? सॉफ्टवेयर डेवलपर की? या मालिक की? यह कानूनी अस्पष्टता बड़ी बाधा है। जब तक स्पष्ट नियम नहीं बनते, तब तक 100% ड्राइवरलेस कारें आम नहीं होंगी।
क्या AI कारें सुरक्षित हैं?
टेक कंपनियों का दावा है कि AI इंसान से कम गलती करेगा। सच भी है कि इंसानी गलतियां — नींद, शराब, ध्यान भटकना — सड़क हादसों का बड़ा कारण हैं।
लेकिन AI भी पूरी तरह परफेक्ट नहीं है।
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खराब मौसम में सेंसर कमजोर पड़ सकते हैं
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अचानक अप्रत्याशित स्थिति में सिस्टम भ्रमित हो सकता है
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सॉफ्टवेयर हैकिंग का खतरा भी मौजूद है
इसलिए सवाल सिर्फ तकनीक का नहीं, भरोसे का भी है।
2030 तक क्या बदलेगा?
ड्राइवर पूरी तरह समाप्त हो जाएं, यह शायद जल्दी होगा। लेकिन 2030 तक ये बदलाव संभव हैं:
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एडवांस ड्राइवर असिस्ट सिस्टम आम हो जाएंगे
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हाईवे पर सेमी-ऑटोनॉमस ड्राइविंग बढ़ेगी
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पार्किंग, ट्रैफिक जाम में ऑटो ड्राइव फीचर बेहतर होंगे
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इलेक्ट्रिक और AI का कॉम्बिनेशन तेजी से बढ़ेगा
यानी ड्राइवर की भूमिका कम हो सकती है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं होगी।
नौकरियों पर असर?
अगर भविष्य में ड्राइवरलेस तकनीक बढ़ती है, तो कैब ड्राइवर, ट्रक ड्राइवर और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर असर पड़ सकता है। लेकिन टेक्नोलॉजी के साथ नई नौकरियां भी बनती हैं — AI मॉनिटरिंग, सिस्टम मेंटेनेंस, डेटा एनालिसिस जैसे क्षेत्र बढ़ेंगे।इतिहास गवाह है कि हर नई तकनीक कुछ नौकरियां समाप्त करती है, लेकिन नई भी पैदा करती है।
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असली सच क्या है?
2030 तक AI कारें जरूर ज्यादा स्मार्ट और सक्षम होंगी। लेकिन भारत जैसे देश में पूरी तरह ड्राइवरलेस भविष्य तुरंत संभव नहीं दिखता। शायद आने वाले सालों में कारें ज्यादा सुरक्षित, ज्यादा ऑटोमैटिक और कम ड्राइवर-निर्भर होंगी। लेकिन इंसानी निगरानी पूरी तरह समाप्त होना अभी दूर की बात है।
निष्कर्ष
ड्राइवर की जरूरत 2030 तक पूरी तरह समाप्त हो जाएगी — यह दावा फिलहाल अतिशयोक्ति लगता है। AI कारें भविष्य जरूर हैं, लेकिन उनका सफर अभी जारी है। टेक्नोलॉजी तेजी से बढ़ रही है, पर सड़क की हकीकत, कानून और भरोसा — ये तीनों बराबर जरूरी हैं। डर भी जायज है, जिज्ञासा भी। लेकिन फिलहाल स्टीयरिंग पूरी तरह खाली होने में अभी समय बाकी है। उम्मीद है आपको हमारी वेबसाइट THE GYAN TV का ये लेख ज़रूर पसंद आया होगा.
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