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पिता ने काटे कलेक्टर ऑफिस के चक्कर, बेटी नहीं है देख कर लिया संकल्प बन गई कलेक्टर

जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं भारत देश में सरकारी ऑफिस में काम करवाना बहुत मुश्किल होता है। सरकारी ऑफिस में काम करवाने के लिए हमें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है। चाहे कोई भी प्रमाण पत्र बनवाना हो या फिर कोई छोटा सा सिग्नेचर क्यों ना हो सरकारी ऑफिस के कम से कम 10 चक्कर काटे भी नाम हमारा कोई भी काम नहीं हो सकता। देश में नौकरशाही हर जगह अपना प्रभाव बना चुकी है। आज इसी के चलते हम आपके सामने एक कहानी लेकर आए हैं। कहानी है रोहिणी की रोहिणी की कहानी आपको प्रेरणा देगी।

एक हस्ताक्षर के लिए पिता ने काटे कलेक्टर ऑफिस के चक्कर

रोहिणी के पिता ने सरकारी दफ्तरों में एक हस्ताक्षर के लिए और अन्य किसी काम के लिए काफी दिनों से सरकारी ऑफिसों के चक्कर काट रहे थे। जब रोहिणी ने अपने पिता को यह सब करते देखा तो वह काफी दुखी हो गई और उसी दिन से उन्होंने आईएएस अफसर बनने का फैसला कर लिया।

महाराष्ट्र के किसान परिवार में जन्मी

रोहिणी का जन्म महाराष्ट्र के एक किसान परिवार में हुआ था। रोहिणी के पिता किसान हैं उनकी शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग करने का निश्चय किया और उसमें वह सफल रही। जिसके बाद उन्होंने सिविल सर्विसेज में अपनी किस्मत आजमाने की सोची और वह परीक्षा की तैयारी में जुट गई। रोहिणी का कहना है कि उन्होंने किसी भी कोचिंग का सहारा नहीं लिया। अपनी मेहनत के दम पर आईएएस की परीक्षा में सफल हुई है। रोहिणी का कहना है कि सरकारी स्कूलों में अच्छे शिक्षकों की कमी नहीं है अगर कोई मन लगाकर पढ़ाई करना चाहे तो।

कहां से मिली आईएएस बनने की प्रेरणा

रोहिणी के अनुसार जब वह 9 साल की थी तब सरकार द्वारा एक किसान योजना चलाई गई थी उस योजना का लाभ उठाने के लिए उनके पिता को सरकारी दफ्तरों के रोज चक्कर काटना पड़ता था। उस समय उन्होंने अपने पिता को परेशान देखकर यह निश्चय कर लिया था कि वह बड़ी होकर आईएएस अफसर बनेंगे और अपने ही जिले में कलेक्टर बनकर लौटेंगी।

जब पिता को बताया तो वह बहुत खुश हुए

रोहिणी ने जब अपने सपने के बारे में अपने पिता को बताया तो वह काफी खुश हो गए उनके पिता ने उन्हें सलाह देते हुए कहा कि तुम्हें जरूरतमंदों की सहायता करना चाहिए। के पिता खुद समाजसेवी थे। उनके पिता ने बताया कि कैसे मिडल क्लास फैमिली को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। एक छोटी सी योजना पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट काट कर जूतियां घिस जाती हैं।

 

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