भारत के त्योहार सिर्फ तिथियों और पूजा तक सीमित नहीं होते। हर पर्व के पीछे मौसम, शरीर, खेती और समाज से जुड़ी एक गहरी सोच छिपी होती है। मकर संक्रांति से पहले मनाई जाने वाली तिल कुठी चौथ भी ऐसा ही एक पर्व है, जिसे कई लोग जानते तो हैं, लेकिन इसके पीछे की असली वजह से अनजान रहते हैं।
अक्सर सवाल उठता है कि जब मकर संक्रांति इतना बड़ा पर्व है, तो उससे चार दिन पहले तिल कुठी चौथ क्यों मनाई जाती है? आखिर इसकी ज़रूरत क्या थी? इसका जवाब सीधे हमारे शरीर, ठंड के मौसम और भारतीय जीवनशैली से जुड़ा हुआ है।
क्या होती है तिल कुठी चौथ
तिल कुठी चौथ मकर संक्रांति से ठीक चार दिन पहले मनाई जाती है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित है। इस दिन घरों में तिल और गुड़ से बनी मिठाइयां, खासकर तिलकुट तैयार किया जाता है।

‘कुठी’ या ‘कुटी’ शब्द का अर्थ होता है कूटना। पुराने समय में तिल को ओखली में कूटकर तैयार किया जाता था। इसी प्रक्रिया से बने व्यंजन के कारण इस पर्व का नाम तिल कुठी चौथ पड़ा।
यह सिर्फ एक खाने का दिन नहीं, बल्कि संक्रांति से पहले शरीर और घर को तैयार करने का पर्व है।
संक्रांति से पहले ही क्यों रखी गई यह परंपरा
जनवरी का समय साल का सबसे ठंडा दौर माना जाता है। इस समय:
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शरीर की पाचन शक्ति कमजोर होती है
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ठंड से जोड़ और मांसपेशियों में जकड़न आती है
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सुस्ती और थकान बढ़ जाती है
भारतीय परंपरा ने इस समस्या का हल खान-पान के ज़रिए निकाला। मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ का सेवन होता है, लेकिन उससे पहले तिल कुठी चौथ रखकर शरीर को धीरे-धीरे इसकी आदत डलवाई जाती है।
यानी यह पर्व अचानक बदलाव नहीं, बल्कि शरीर को संक्रांति के लिए तैयार करने का तरीका है।
तिल और गुड़ को ही क्यों चुना गया
तिल और गुड़ को भारतीय संस्कृति में सर्दियों का सबसे उपयुक्त भोजन माना गया है।
तिल के फायदे
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शरीर को अंदर से गर्म रखता है
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हड्डियों और जोड़ों को मजबूती देता है
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ठंड में होने वाले दर्द से राहत देता है
गुड़ के फायदे
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पाचन सुधारता है
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शरीर में तुरंत ऊर्जा देता है
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सर्दियों की सुस्ती कम करता है
तिल कुठी चौथ पर इन दोनों का एक साथ सेवन शरीर को आने वाले ठंडे दिनों के लिए मजबूत बनाता है।
‘कुटी’ जाने वाली परंपरा का सामाजिक मतलब
पहले तिलकुट मशीन से नहीं, बल्कि हाथ से कूटे जाते थे। इसमें घर के कई लोग शामिल होते थे। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग — सब मिलकर तिल कूटते थे।
इस प्रक्रिया का मतलब सिर्फ मिठाई बनाना नहीं था, बल्कि:
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परिवार का एक साथ समय बिताना
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बातचीत और मेल-जोल
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त्योहार का माहौल बनाना
यही वजह है कि तिल कुठी चौथ सामाजिक जुड़ाव का भी पर्व रहा है।

महिलाओं के लिए क्यों है खास दिन
कई इलाकों में तिल कुठी चौथ को महिलाओं से विशेष रूप से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इस दिन तिल और गुड़ का सेवन करने से:
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शरीर में ताकत बनी रहती है
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सर्दियों में कमजोरी नहीं आती
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घर में सुख-शांति रहती है
इसी कारण महिलाएं इस दिन साफ-सफाई करती हैं और घर में खास तौर पर तिलकुट बनाती हैं।
संक्रांति का पहला कदम है तिल कुठी चौथ
अगर ध्यान से देखें, तो मकर संक्रांति एक दिन का नहीं, बल्कि कई दिनों में आने वाला पर्व है।
उसकी शुरुआत होती है:
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तिल कुठी चौथ से
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फिर तिल-गुड़ का सेवन बढ़ता है
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घर में उत्सव का माहौल बनता है
यानी तिल कुठी चौथ संक्रांति की भूमिका है, उसका पहला चरण।
आज के समय में इसका महत्व
आज भले ही रेडीमेड मिठाइयां और फास्ट लाइफस्टाइल आ गई हो, लेकिन तिल कुठी चौथ का महत्व आज भी उतना ही है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि:
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मौसम के अनुसार खान-पान बदलना जरूरी है
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शरीर को धीरे-धीरे बदलाव के लिए तैयार करना चाहिए
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परिवार के साथ समय बिताना भी सेहत का हिस्सा है
क्यों भूलते जा रहे हैं लोग यह परंपरा
शहरी जीवन और समय की कमी के कारण तिल कुठी चौथ जैसे छोटे पर्व धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। लेकिन यही छोटे पर्व हमारी संस्कृति की असली पहचान हैं।
जब हम इन्हें भूलते हैं, तो सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों का अनुभव और समझ भी खो देते हैं।
निष्कर्ष
तिल कुठी चौथ मकर संक्रांति से पहले इसलिए मनाई जाती है क्योंकि यह शरीर, मन और परिवार — तीनों को संक्रांति के लिए तैयार करती है। यह पर्व ठंड के मौसम में सेहत को संभालने और सामाजिक जुड़ाव बनाए रखने की एक समझदार परंपरा है।
भारतीय त्योहार सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित रखने का तरीका हैं — और तिल कुठी चौथ इसका बेहतरीन उदाहरण है।
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